Tuesday, August 14, 2012

आजादी में महंगाई की मार

इस १५ अगस्त हमारा देश ६५ साल का हो जायेगा , कहने को तो आज आजादी का दिन है ,|पर उनके लिए जो सिर्फ अमीर   है , आजादी १९४७ में मिली तो हमारे पास सब कुछ था , एक महगाई नहीं थी ,| अब वो दिन पर दिन आजादी के साथ अपना पर्व भी मना रही है , भारत का अन्य मुद्रावो को ढोना, आर्थिक गुलामी जैसा है , एक गाना तो आपने सुना ही होगा महगाई डायन खाय जात है , आइये जानते है, महगाई के कारण , पहला प्रमुख कारण है , आधुनिकीकरण की अंधी दौड़ , 


अभी बहुत दिन नहीं हुए , जब ५ पैसे से भी कम पैसे चलते थे , लोग साइकिल को हीरो जेट की तरह सजा कर रखते थे , परन्तु आज की उडती महगाई की मार बेहिसाब गरीब पर पड़ रही है , परन्तु यह महगाई जब जब बढ़ेगी तो देश भक्तो को सचेत हो जाना चाहिए की यह सरकार ठीक नहीं है ,  चाहे वह किसी की भी दल की  सरकार हो , मैंने एक research भी किया  है, कि, किसका कितना कालेधन कहा है? , इसमें सभी प्रमुख पद वाले व मिलीभगत वाले है , स्विस banko में तो १०० करोंड़ तो starting है ,|

जो होता है , पेट भरने के लिए हो , पर यहाँ तो आधुनिकीकरण का ऐसा नसा और चस्सका है ,| की बस इसके बिना नहीं रह सकते , मोबाइल, t v ..ac , फ्रिज, कंप्यूटर, के बिना नहीं रह सकते , भले ही बिजली न रहे , अब तो घर घर की शान मोटर साइकिल , के बिना भी, घर से निकलना इज्जत का सवाल हो गया है , कल तक ये सब नहीं था , तो महगाई बिलकुल नहीं थी , |
यदि सरकार घोषणा कर दे की तेल- गैस के दाम बेवजह , बढ़ रहे है , |अब जनता विभिन्न माडल वाली साइकिल से चलेगी तो ये  तेल व गैस कंपनिया अपने औकात पर आ जाएगी , क्यों की काम भर तेल तो हमारे भारत में भी है , और हमारे पडोसी गरीब देशो में पेट्रोल- गैस के दाम यहाँ की भारत की तुलना में काफी कम है ,?|फिर हमारे यहाँ यह महंगा कैसे है ,|?
लोग भूखो मर रहे है , अनाज वर्षा से भीगकर और तथा गोदामों की थर्ड क्लास रख रखाव में सड रहा है , पर यह किसी को मुफ्त नहीं मिलेगा , क्यों ,,,,,,क्यों की महगाई बढ़ाना है , इन अनाजो को मिलो में नहीं भेजा जायेगा , इनके कुरकुरे चिप्प्स, बिस्कुट, और पिसा आटा packet नहीं बनेगे, अगर उत्पादन से उत्पादन नहीं बना सकते तो ये अन्न पडोसी देशो को उधार या फ्री में गिफ्ट कर दो निर्यात करो क्यों की जब मेहनत सड़ती है तो प्याज के आंसू नहीं निकलते , ?????

मेरी दूसरी बात  महगाई का कारण है , corruption भ्रस्टाचार ये अपना काम तो करते नहीं , बल्कि दुसरो को भी अपना काम करने में गतिरोध करते है , क्यों की जहा जल होगा वहा तो कुछ तो छलकेगा ही  , एक मजदुर लाख रूपये कमाते- कमाते मर जाता है , यदि व्यक्ति का जीवन बीमा हो सकता है तो , फिर करोंडो की बनी सडको का बीमा , हर्जाना, सजा , क्यों नहीं ?  हमें या तो एक सख्त सरकार चाहिए या एक सख्त कानून, या सख्त जनता  ?????
   लेखक ;-देखते सुनते .....रविकान्त यादव 

Friday, August 10, 2012

भक्त और भगवान



एक भक्त थे , मनोयोगी जब -तब भगवान के दरबार मे पहुच जाते समय के साथ साथ भक्त सप्रेम जीवन निर्वाह करते रहे , धीरे-धीरे उनकी गृहस्थ जीवन मे सुख -खुशी आदि ने कदम रखा उनका जीवन सुखमय बीत रहा था , |

 इसी क्रम मे एक बार उनकी बेटी बीमार ,पड़ी रात भर  दुबिधा मे थे , दूसरे सुबह एक व्यक्ति उनके दरवाजे आ जाता है , भक्त संकट से खिन्न उस द्वारे आए याचक को भगा देता है ,|

तथा दवा दारू के फेर मे व्यस्त रहता है ,| रात होती है  , उस भक्त को वही याचक सपने मे आकर , कहते है ," वाह शोभनाथ  तुमने अपने बीते दिनो मे मुझे वक्त -बेवक्त बेवजह दर्सन कर -कर के परेशान कर दिया , और आज मै तुम्हारा दर्शन करने आया तो तुमने मुझे दरवाजे से ही झिड़क दिया , "


इसी क्रम मे भक्त की नीद टूट गयी , भक्त भरे रात मे रोते -चिल्लाते भगवान धाम द्वारकाधीश के मंदिर दौड़ पड़े , |
रात को द्वार के कपाट बंद थे , सुबह दर्शन कर जैसे ही ,भक्त घर पहुचते है ,| उनकी बेटी की तबीयत ठीक हो चुकी थी , वह हस खेल रही थी ,|

लेखक ;- व्यस्त ...रविकान्त यादव

Wednesday, August 1, 2012

समय

दोस्तो आज मेरा जन्मदिन है , इसलिए अपनी कहानी मे एक लिख रहा हु ,एक बार  एक तपस्वी हुए ,अपने ज्ञान तप-कर्म से उन्होने अन्य ग्रहो के देवता तक को विवश कर दिया
 ,देवता खिचे चले आए ,खिचे चले क्या आए गुलाम ही बन गए , क्यो की वो उन तपस्वी -कर्मवीर के आगे कही ठहरते  नहीं थे , देवता गुलाम की तरह उनके आदेशो को मान  रहे   थे , |

देवता आते और उनकी इच्छा पूरी कर चले जाते , इसी तरह उनको तपस्वी को एक दिन इस पृथ्वी से मोह भंग हो गया उन्हे लगा ये पृथ्वी ठीक जगह नहीं है , बहुत देख लिया ऐसी जगह , यहा का क्या प्राकृतिक नियम है ? यहा सभी खुश -सुखी नहीं है , अच्छे है तो ,लेकिन बुरे भी है ,दोनों  का अपनो पर बस नहीं है , यहा का न्याय बहुत पेंचीदा है , अब मै पृथ्वी पर नहीं आयुगा उन्होने देवतावों को बुलाया और वो तुरंत आ गए इस तरह उन्होने जाहिर किया ,चलो मै अब पृथ्वी नाम इस गृह  पर  नहीं रहुगा , तभी एक चतुर देवता चित्रगुप्त ने कहा हे ,परम आप भी परमेश्वर तुल्य है , परंतु क्या आपको किसी का कर्ज  लेकर इस तरह सशरीर चले जाना उचित लगता है ,|

इस पर तपस्वी ने कहा कैसा ऋण ? तब उन्होने (चित्रगुप्त) ने कहा आप परम ज्ञानी है फिर भी आप को ये पता  तो होगा ही ,कि आपने इस पृथ्वी पर ही सभी कुछ प्राप्त किया , ज्ञान ,तप, भोजन, सुख, दुख, रिश्ते, नाते, और ये शरीर सभी कुछ, तो क्या पृथ्वी माता का ऋण लेकर आप यहा से जाएगे ?क्या उनका कर्ज वापस करना आपका कर्तव्य नहीं बनता, केवल आप का एक प्राण -ऊर्जा ही इस पृथ्वी का नहीं है,| वरना सभी कुछ आपके इस पृथ्वी माता का ही है , |तभी पृथ्वी भी प्रकट हो जाती है , और समय , अवधि ,प्रेम , बचपन खेलकूद का वास्ता देकर याद निशानी  की बात कहती है , |

तपस्वी समझ गए थे , मै यह बेकार शरीर नहीं ले जा सकता , मै इस जन्म  मे पृथ्वी माँ तो क्या माँ का भी कर्ज नहीं चुका सकता , और इस तरह तपस्वी अपने शरीर को पृथ्वी माँ के लिए याद स्वरूप
छोड़ , जहा का प्राण था ,वहा  चला गया ,............||

लेखक ;- प्राणी ...रविकान्त यादव(join me on ravi.k.yadav16@facebook.com)