Saturday, September 26, 2015

क्यों कि _अच्छाई (because goodness)

१) बड़ो से इज्जत से छोटो से प्यार से दोस्तों से सद् भावना से बोले ,क्योकि इससे आप दुसरो पर विश्वास करना सीख सकते है ।
२) दुसरो की बातो पर ध्यान दे व सीखने योग्य हो तो सीखे , क्योकि अहंकार करने की कोई उम्र नहीं होती ।
३) अभाव व कष्ट  कोई परेशान करने वाली बात नहीं है । क्यों कि यह तुम्हे नियंत्रण व सादगी सिखाती है । 
४) बुजुर्ग ,बड़े लोगो की इज्जत करे क्योकि कभी न कभी वह तुम्हे कुछ देकर ही जायेगे ।
५) समय हमारा सर्वोच्च गुरु है ,अतः इसे कोसना मूर्खता है ,क्यों कि  हमें  कुछ बातो की सोच तक नहीं होती ।

6) सच्चे पुरुषार्थी मेहनती को भगवान  भी धन ,ज्ञान , वरदान , देने के लिए बाध्य हो जाते है , क्योकि पसीना स्वतः नहीं उत्पन्न होता है ।
7) निश्छलता सीखनी हो तो बच्चो से अच्छा कोई नहीं मिलेगा  क्योंकि आईने में आप स्वयं को ही नहीं देख सकते ।
8)त्याग,परित्याग,हमें मानव बनना सिखाता है , क्योकि जीवन तो अन्य जीवो में भी है ।
9) बुरे व्यक्ति मकड़ी के जाले  मे फसे मक्खी जैसे है , । क्योकि उनसे ऊपर भी कोई है । 


10) जीवन जीना  भी एक कला है , क्योकि सदुपयोग व कीमत आप पर निर्भर है ।
एक व्यापारी से पूछा गया आपकी सफलता का राज़ क्या है ,तो उसने कहा जो चीज़े मै बनाता हु,उसे पहले अपने लिए बनाता हूँ ।


लेखक;-क्योकि सीखते हुए… रविकान्त यादव 




Saturday, September 5, 2015

विकार (addiction)

कहते है ,हिन्दु धर्म में काम ,क्रोध,मद,मोह,लोभ, ईर्ष्या वे मानव जीवन के विकार है ,। अतः इन्हे त्याग करना चाहिए , जो हम जानते ही नहीं ,उसे क्या त्यागे ???? मेरा आशय है ,ये सब न हो, तो व्यक्ति मानव कहा रह गया , इस हांड -मांस व चमड़ी के शरिर को इन विकारो की बहुत जरुरत है , यदि जीवन है ,तो इन विकारो की बहुत जरुरत है ॥
ऐसा मेरा मानना है ,अन्यथा वह व्यक्ति मरा  हुआ है, । इन विकारो को जाने व समाज हित में मोड़े ,मेरा आशय है , इन विकारो को दूसरे अर्थो में लेने का ,………

1 )यदि हम गृहस्त होगे तो श्रीराम ,कृष्ण या अन्य जैसा समाज को उत्थान करने वाला पुत्र मिले ।

2 ) क्रोध हो तो अपने दुर्गुणों से व्यसन से , देवी दुर्गा ,देव परशुराम की तरह सही व समाज कल्याण हेतु

3 )मद हो तो भगवान महावीर की तरह बुद्ध की तरह ,भगवान वामन की तरह ऐसा, की मै ही संसार में सबसे निम्न -नीचे ,मेरे जैसा विनम्र कोई हो तो मै उससे मिलूँगा ।
4 )मोह, मेरा मोह ऐसा हो ,कि ये बंधन को एकजुट हो ,प्यार,अहसास ,जज्बात ,आदर ,समर्पण का ,देवी माता सीता की तरह , भक्त मीरा की तरह , प्रभु चैतन्य की तरह , कबीर और रविदास की तरह भक्त प्रह्लाद व ध्रुव की तरह इस डोर को थामने पर  ईश्वरीय या अन्य चाहत की जरुरत नहीं , यही जीवन की रित  हो। ...
.
5 )लोभ ,ऐसा हो ,जो सदा मदद को तत्पर हो , एक गुरु की तरह , मेरी भलाई से कोई बच न पाये ,ये भावना होनी चाहिए। ………

                               
6 )ईर्ष्या हो तो प्रेरणा के रूप में ऐसी उभरे की मै उससे बेहतर बन कर रहुगा । तमाम सदगुणो को अन्तहकरण में उतारूँगा -ठीक बड़े भाई राम की तरह ,भरत बनकर ,कर्ण ,एकलव्य बनकर हो। ………
ये जीवन अमूल्य है । हम मानव है ,और ईश्वर नहीं हो सकते परन्तु संसार में आत्म शुद्धि , पवित्रता , सही होते हुए इस तरह चलने पर देवताओ को भी आपसे ईर्ष्या हो सकती है । 
लेखक;- संसारिक  … रविकान्त यादव