Thursday, December 31, 2015

मेरे अमर विचार part 3 my immortal thought my way and my world


*पुर्वअनुमान  और पूर्वनिर्धारण क्या है ?, -तैयारी है , तैयारी क्या है ? तैयारी ,प्रबंध है । प्रबंध क्या है ?, प्रबंध समय की बचत है , । समय की बचत क्या है ,? समय बचत पैसा है , । पैसा क्या है ?पैसा उपयोग है ।

* यदि हम किसी बात पर क्रोध करते है।, तो इसका तात्पर्य क्रोध हमारे अंदर किसी बात पर या अन्य अपना घर बनाये हुए है , तब हमें  अपने अहम का तुरंत परित्याग करना चाहिए । भगवान महावीर की तरह । 

*यदि आप पढ़े लिखे या जानकारी रखे है , तो बातो पर ताली नहीं, उसे यथार्त पर ताली बजानी चाहिए क्यों की तब आप उससे प्रभावित होते है । 

*देश के लिए व देश भक्ति के लिए जातिवाद एक लाइलाज विषदंश है । 

*यदि कोई बड़ा दिलवाला नहीं है , तो यकीन मानिये उससे कभी भी हित की आशा न करे, दूरी रखे  । 

*जलन एक ऐसा विकार है , जिसमे अंतर्रात्मा तक झुलस जाती है । 

* दुसरो को निचा दिखाने व बुरा चाहने वाले संक्रमित रोग बांटते है । 

* राजनीति सिर्फ राजनीती में चल सकती है , अन्य जगह इसका सहारा  असुरक्षा है । 

* दुसरो को आगे बढ़ते न देख पाने वाले काबिल रहते हुए भी सदा वही (पीछे ) ही लटके रहते है । 

* हालात ,हल और हरियाली ये तीन शब्द हमारे राष्ट्रीय ध्वज को दर्शाते है , ये शब्द हमारे देश की किसी भी परिस्थिति को संभाल सकते है ,और भारत के सभी किसानो को खुशहाल बना सकते है । 

* यदि हम बोलते है तो ,इतना जरूर मनन हो भीड़ हमारी हर बात पर सहमत और ताली नहीं बजा सकती । 

* धरती एक ही है , परन्तु हर जगह अलग -अलग स्वाद के फल -फूल -फसले उगती रहती है , अर्थात अच्छाई कही भी किसी भी हाल में राहत प्रदान करती है । 

*एक कंजूस , अय्यास से बेहतर है । 

* वह झूठ , झूठ नहीं रहता , जिससे किसी का भला हो और दिल न दुखे । 

* झूठी चाहत गर्व, झूठे व्यक्ति से भी बदतर है । 

* माफ़ी मांगने में देरी न हो क्यों की , इसके लिए सर्वदा समय नहीं रहता ।

* क्रांति के लिए एक छोटे बच्चे का दो कदम ही काफी है । 

* नाव तो नाव है , परन्तु बिना पतवार उसकी विशेष अहमियत नहीं अर्थात पद के साथ गुण ,आदर्श भी होनी चाहिए । 

*दोस्ती में गलत फहमिया दुश्मन से भी बड़ा दुश्मन बन जाती है । 

* आप कहेंगे इतिहास क्या है , उत्तर है ,ज्ञान ,।  अतः इतिहास सिर्फ हमें सिखाता है । 

*वर्तमान समय में जो स्वाभिमानी ,जो दूसरे से मदद और पैसे की चाहत रखता है, वो बेवकूफ है । 

* ज्ञान ही अच्छाई और बुराई का निर्णय करता है । 

* समस्या , ज्ञान के साथ धीरज ,का समय होता है ।


* धरती पर हमारा उद्देश्य क्या है ,? एक यह की हमें जीव -जन्तुओ की मदद के लिए यहाँ जन्म लिया है , दूसरा व अन्य आप खोजे । 

*अपराधी अपने ही मकड़ जाल में फसता चला जाता है । 

* बादशाहत को, हमें उन उड़ते बिना पंख हिलाये ऊँचे व हवा में उड़ते पक्षियों से सीखना चाहिए । 

* शांति , ज्ञान को बढ़ने का अवसर है । 

* हमारी सोच एक जगह अटकनी नहीं चाहिए । 

* समय ही नियति निर्धारण कर सकता है ।


* आत्म निर्भर , आत्म विश्वासी से बेहतर है । 

*बचपन फल के बगीचे जैसा है , और बचपन को ताजा करना है ,तो फॉलो के बाग़ में आज़ादी के साथ शामिल हो । 

* अच्छे सिधान्तो का होना अजेय होने से बेहतर है ।


* सम्मान  झूठा न हो  , क्यों की मान उस योग्य बनाता है । 

*अधिक पैसे वालो को सोचना चाहिए की प्रत्येक कार्य पैसे से नहीं हो सकता ।

*जब कभी हमें अपने आप पर किसी कार्य से गर्व हो या बहुत खुशी मिले तो अपने आप पर गर्व करने की अपेक्षा अपने आँखों को बंद करे और अपने बुजुर्गो दादा - दादी,नाना-नानी-के स्नेह को याद करे अपने माता पिता को सुक्रिया करे अपने गुरुजनो का आदर करे और सर झुका कर मन में कहे आज मै जो भी हु इन्ही लोगो का लगाया एक बीज हु और इसी बीज़ से मै भविष्य में एक और वृक्ष  की कामना करता हु ।

* यदि आप समझ नहीं पा रहे है , परेशान है , व परिस्थितिया आप के अनुसार नहीं है तो कारण का चिंतन करे व सज्जनता के साथ नम्रता व दया का भाव रखे व ज्ञान को ही स्रोत बनाये व हर समस्या का समाधान ज्ञान ही होता है ।


*घटिया सोच के साथ घटिया कार्य करने वाले आदर योग्य नहीं होते ।

* वो दोस्ती ही क्या जिसे साबित करना हो ।

* मेरी कोई चाहत नहीं है ,और कोई चाहत है ,तो यही की कोई दुखी न रहे ।

* विश्वास एक न दिखने वाला अहसास है , जिस पर पूरी बुनियाद होती है ।


* परिश्रम  को कटु आलोचना किसी भी दशा में तिरस्कृत नहीं करना चाहिए ।

* उत्तम चरित्र उच्च शिक्षा से बेहतर है ।

*महानता पर अधिकतर सौ में से एक -चार आपत्ति कर सकते है , पर उनकी बात मानकर सुनकर ,स्वयं की आत्मविश्वास पर प्रश्न चिन्ह न लगाये , सूरज -चाँद पर तमाम लोग उंगली उठाते है पर तमाम लोग ही नहीं वो स्वयं भी उसकी महानता से अनजान नहीं होते|


*शास्त्रो ,पुराणो , चाणक्य नीति सहित तमाम जगह लिखा गया है दोस्त ऐसे होने चाहिए दोस्त वैसे होने चाहिए ,   ये उनका काम है , पर मेरे लिए मै उनका निस्वार्थ -हितैसी हु ।

*प्रतिभा दब -छिप नहीं सकती ।

*पहुचता वही है, जो चलता है ।

*हर बात अपने ऊपर सोचने वाले तेज़ तो हो सकते है पर चतुर नहीं ।

*सच्चे गरीब लोग हर जगह आदर योग्य होते है हर जगह इज़्ज़त पाते है , परन्तु बड़े व  घटिया सोच वाले कही भी आदर योग्य नहीं होते ।

* हमारा अहम ही हमारा सबसे बड़ा अज्ञान है ।

* किसी को तुरंत समझना संभव नहीं फिर भी बुरे लोग पहले ही नज़र में कही न कही गलत होते है ।

*महाभारत में एक बार शिव से वरदान पाने के बाद जयद्रथ अपने महा  तपस्वी ऋषि,  पिता के के पास गया तथा आशीर्वाद वरदान स्वरूप अपने को इच्छा मृत्यु का वरदान माँगा तब उसके पिता ने कहा न तुम गंगापुत्र भीष्म हो और न मै शांतनु फिर भी मै इस वरदान को अप्रत्यक्ष रूप से तुमको प्रदान करता हु ,अतः अच्छाई की तुलना व ताकत अपनी जगह है ,व बुरे लोगो की इससे तुलना नहीं हो सकती ।


*जहा अधिकार होता है , उन रास्तो  पर  बनस्पतिया भी नहीं उगती ।

* जो फिसलता है , सच्चे अर्थो  में वही चलने के आनंद और चलना जनता है ।

* जिस प्रकार बिना ईंटो के महल नहीं बन सकता उसी प्रकार बिना चरित्र निर्माण के सम्मान नहीं बनता नहीं मिलता ।

*अच्छाई के लिए हज़ारो विकल्प होते है , परन्तु बुराई के लिए कोई विकल्प नहीं होता ।

* हर इंसान में एक हीरो होता है , बसर्ते वह दिल, करुणा, व सहारे को जाने ।

* यदि कोई सोचता है , मै ये हु , अन्य मेरे अपेक्षा छोटे है , बस यही विचार उसे दुनिया का सबसे तुच्छ व्यक्ति साबित करने के लिए काफी है ।


* जब इंसान की इरादा व नियत ही गलत हो तो उसे दुनिया का कोई व्यक्ति अच्छा नहीं बना सकता ।

* हार - जीत  हमारी इरादो व विचारो पर निर्भर करती है ।

* योगदान कभी छुप नहीं सकता , और यह अवसर भी बार बार  नहीं आता अतः इसमें शामिल होने से पूर्व सोचना जरूर चाहिए ।

* संदेह बेबुनियाद नहीं होता , परन्तु उस वक़्त हम आत्म तसल्ली को भूल जाते है ।

* सहारा लेना सफलता का रास्ता नहीं है , परन्तु दिशा निर्देश इसे प्रसस्त करता है ।

* हम हिन्दू पत्थरो की पुजा  नहीं  करते , बल्कि उसमे बसने वाले आदर्शो , सिद्धांतो की पूजा करते है , और उसे भूलना नहीं चाहिए ।

* सफलता सीखनी है तो , अपने सभी आलोचकों को जुटा  लो ।

* ऐसे रास्तो पर चलो ताकि पीछे देखने पर उन पद चिंन्हो पर गर्व हो और उन्हें मिटाने  का दर्द न लेना पड़े ।

* आशा से विश्वास बनने में समय लगता है ,परन्तु विश्वास से विश्वासघात में कोई समय नहीं लगता ।

* गुरु से गुरुर हो सकता है, परन्तु गुरुर से गुरु बिलकुल नहीं ।


* प्यासा पानी (राहत )खोजता है , जिज्ञासु ज्ञान खोजता है ,परन्तु सच्चे अर्थो में सफल वही है , महापुरुष वही है जो अपने आप को खोजता है ।

* एक शिष्य के लिए गुरु की महत्ता उसकी महानता व नीचता पर निर्भर करती है ।

* शिक्षार्थी को शिक्षित करना  ही उसका दायित्व व अहमियत नहीं है , बल्कि यह एक जीवन पर्यन्त चलने वाली प्रकिया है ।

*अध्यात्म हमें जमीन पर रह कर उचाई हासिल करना सिखाता है ।

*राजनीती अच्छी चीज़ है , परन्तु इससे उपजने वाले करक हमें भ्रस्ट बना देते है ।

*चाहत ,शौक , शौक -आदत , आदत -लत, लत- दुश्वारियां ,और दुश्वारियां ,मुश्किलें बन जाती है ।

* हर विचार , हर प्रत्येक व्यक्ति के लिए नहीं हो सकते ।

*यदि सवाल (प्रश्न ) अनुचित हो तो , तब उसके बदले जरुरत होती है एक और प्रश्न की ।


*किसी को पग-पग पर सँभालने से १०० प्रतिसत कही बेहतर है , उसे उस योग्य , सतर्क बना दो की उसे इसकी जरुरत ही न पड़े ।


*ज्ञान  ,अनतरात्मा की पहचान है , इसे घोल कर पिलाया नहीं जा सकता ।

*सबसे बड़ा मुर्ख वह है , जो सोचता है ,इस क्षेत्र में मै तो महारत बन चूका हु । परिस्थितिया , नज़ारे व ध्यान ही ज्ञान की सही परख है ।

* ज्ञान ,ताक़त, आत्मरक्षा व सुरक्षा के लिए होती है , तानासाही व गुंडागर्दी के लिए नहीं ।

* मदद दोस्ती का दूसरा नाम है ।

* दुनिया का सबसे बड़ा उत्सव मनाना हो तो दुनिया के सभी बच्चो को एक जगह एकत्र कर उनकी इच्छाओ का ध्यान रखो  ।

*हर क्षण त्याग की भावना रखने वाले को धरती पर कोई परास्त नहीं कर सकता ।

*रिश्ते एक तरह से अापस में उलझे धागे जैसे होते है , पता न कौन सा धागे को जिसे खीचने पर उलझन दूर हो जाये ।

*जिस तरह तुम्हारा दिल तुम्हारे सरीर को सजीव व चेतन बनाये रखने के लिए खून को धक्का मार कर शरिर के हर अंग तक पहुचाता है , उसी तरह महापुरुष अपने अच्छाई ज्ञान को समाज कल्याण व जनहित के लिए सत्य हेतु अच्छाई के लिए उसे जरुरतमंद हेतु पुरजोर प्रसारित करते है ।


* अपने आप को बहुत बड़ा सम्राट समझने वाला कभी जनता की योग्य भलाई नहीं कर सकता ।

*हिन्दू धर्म  को समझना है ,तो , महीने के ३१ दिन में से औसत २५ दिन को कैलेंडर में  देख लो ।

*एक शिक्षक आप को सब कुछ सीखा सकता है , परन्तु निर्णय व सूझ बुझ नहीं , और इनके अभाव में आप कसी योग्य नहीं , अशिक्षित समान ।


*खुस रहने के कारण तुम जो हो उसी में अच्छे हो , ज्यादा राय , विचार ,मत जानना , व्यर्थ सोचना  जाल बुनना  ये बाते तुम्हारे अस्तित्व को ही ख़त्म कर देती है ।

* समय कैसे गुजर जाता है , ये हमें पता नहीं चला लेकिन समस्या या उसकी अहमियत तब पता चलती है , जब हम उसका मूल्याङ्कन करते है ।

* यदि हम कोई नयी इतिहासिक सार्थक कार्य करते है ,तो हमारा नाम उसके साथ तब तक जुड़ा रहेगा जब तक जब तक वह कार्य सफलता से चलता रहेगा ।

* सामान्य मनुष्य आवयस्कताओ  को ही अपनी मंजिल मान लेता है ।

* प्रतिभा दब छिप नहीं सकती ।


* पहुचता वही है , जो चलता है ।

* संघर्ष उपलब्धियों का वह सूरज है , जिसकी परछाई साथ चलती है ।

* संगठन बनाना कठिन नहीं है , जितना की उसके साथ चलना ।

* बड़ा दिल रखने से ही लोक आधार मिलता है , जैसे घड़ा होता है , और नम्रता (जल) बन जाता है ।

* आदमी सभी सही होते है , पर उनके कर्म व स्थान गलत होते है ।

* भक्ति को शक्ति एक मात्र कर्म ही प्रदान करता है ।

* प्रेरणा काफी हद तक हमें यदि राह पर नहीं तो पगडंडियों पर जरूर ला देती है ।



* मेरा अहम ,एक जमीन पर गीरा  हुआ अन्न का दाना है , देख लिया जाऊ तो कर्म करने वाले के पास , छोड़ दिया जाऊ तो चिड़ियों चुनमुन के काम  , बच जाऊ तो उदय हो कर पशुओ के भरण -पोसण  के कार्य , उसके पश्चात भी रह जाऊ तो धूल में मिलकर जीव परमार्थ ही मेरी नियति है ।


*अच्छाई को खोजने की जरुरत नहीं अवसर पर वह स्वयं उपस्थित हो जाती है ।

* यदि चरित्र दूध है ,तो समाज जनित दोष ताम्बे का बर्तन ।

*तप तभी सार्थक होता है , जब मन में अहिंसा के साथ अतिस्योक्ति  हो और ये तप ही एक मात्र  आत्म शुद्धि , ज्ञान और मोक्ष का अधिकारी है , परन्तु स्मरण योग्य यही होगा कि तप  तो देवता भी करते है ,और दानव भी ।

* अपने आप पर निर्भर करने वाला कभी नहीं टुटता , सदैव ऊर्जावान रहता है ।


*अगर आप दुश्मन या दुर्जन जानना चाहते है, तो कोई कार्य करे व पूछे , दुश्मन सदा आपके अच्छे में से या अन्य से बुरे कार्य को चुनेगा , और उसे विस्तृत बतायेगा  ।

* अगर आप अच्छे है तो आपकी अच्छाई ही आपका रास्ता बताएगी ।

* कुछ बाते आपके जरुरत योग्य नहीं होती , मायने ही नहीं रखती , उनपर प्रयास क्यों करना उन पर प्रयास करना बेवकूफी है ।

* एक लक्ष्य साधकर समर्पित चलने से आपको छोटी मोटी अन्य बाधाये डिगा नहीं सकती ।

* असंभव को संभव केवल व्यक्ति का जूनून ही सहायक है ।

* दोस्ती और ईगो (अहम ) में से केवल एक ही चल सकती है ।

* सोच का दायरा सिमित नहीं होना चाहिए । और इसे स्थाई भी नहीं होना चाहिए ।

* निराशावाद मानव के शब्द कोष में नहीं होनी चाहिए , वैसे भी निराशा वाद जिंदगी को जहन्नुम बनाने के लिए काफी है ।

* हर नाकामयाबी दूसरा रास्ता अपनाने को कहती है ।


* आप के विरोधी व चिढ़ने वाले तमाम मिलेंगे जो ये साबित करेंगे ,की आप उनसे बेहतर है ।

*अँधेरा सच्चे अर्थो में जीवन की उपयोगिता दर्शाने व तलासने के औचित्य  के लिए आता है  । अतः इस अवसर पर विचार ,ज्ञान,दिशाहित कर्म ही कार्य आता है ।

* भींड के साथ चलने से एकमात्र यही फायदा होता है ,कि आपको बहुत ज्यादा सोचना नहीं पड़ेगा ।

* चेहरे के भावो को छिपाया जा सकता है , परन्तु जज्बात को हम लाख चाह कर भी नहीं छिपा सकते ।
         लेखक;- विचारक........... रविकान्त यादव join me ;-facebook.com/ravikantyadava










Wednesday, December 23, 2015

मै अमर हु (i am immortal )


अमर होने से तात्पर्य है , कर्म , पहले वह कर्म तो हो जिससे हम अमर हो जाय , एक फिल्म में कहा गया है , सौ साल जीना  जरुरी नहीं  है  , एक दिन में वह कार्य करो जो सौ साल के बराबर हो । 
अमर कौन है ? अमर वही है , जो कोई वर नहीं चाहता कोई इच्छा नहीं रखता जैसा की एक फिल्म forbidden  kingdom  में एक चरित्र बताता है, यदि  हम अपने इच्छाओ व मोह को त्याग ,साथ मिलकर, दुःख सुख मिलकर जिए वह अमरता से बेहतर होगा  । 


बस जीवन भर सच्चे कर्म पर अधिकार रखने वाला ही अमर है ,। ध्रुव अटल तपस्या करता है , भगवान विष्णु आते है , कहते है ,नन्हे बालक वर मांगो , वह कहता है कुछ नहीं बस आप का सानिध्य ,प्रेम, सच्चाई , भक्ति चाहिए ,

वरन प्रभु उसकी बात ही नहीं मानते बल्कि उसे अटल व तारो में सबसे पवित्र व चमक से परिपूर्ण तारा  बना देते है ,सच है जहा प्रेम , निस्वार्थ भाव ,व तप  है , वही अमर है । 

एक पत्थर अहिल्या जो रामायण में थी , अमर थी ।  , उसे पत्थर बनने का श्राप मिला था , फिर भी उसे शाप से मुक्ति चाहिए थी , वह अमरता किस  योग्य जहा पत्थर ही बनना पड़े । अर्थात अमरता अभिशाप के समतुल्य जो जाती है । 
तमाम पौराणिक कहानियो में दानव कठोर तप  करते है , सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा आकर उनसे वर  मांगने को कहते है , तो वो अमरता का वर मांगते है ,? ब्रह्मा कहते है , कुछ भी अमर नहीं है ,अर्थात इसके समतुल्य कोई वर मांगो , 
जब हम जानते है ,कि कुछ भी अमर नहीं है , तो अमर होना कैसी चाहत है ,? सच कहु तो अमर होने के हम स्वयं अधिकारी नहीं है । हम यह तय नहीं कर सकते , सूरज -चाँद १२-१२ घंटे ही रहते है , हवा -जल भी एक सी नहीं रहती , पेंड -पौधे भी विरासत में अपने बीज ही छोड़कर निर्जीव हो जाते है , ये सभी अधिकार व नवीनता के लिए अत्यंत आवयश्क  है , सच कहु तो हम अमर है , परन्तु हम देख नहीं पाते , हमारा योगदान सर्वदा है , उपयोग व पहचान की  कीमत पर ।
 बहुत सी कहानियो मैंने पढ़ा है , जो अमर हो गये वो  पछताते है , मरने के लिए ,जैसे एक अस्वस्थामा की कहानी है । सच कहु तो जीवन का आनंद मरने में ही है , 
शायद जो ज्ञान व कार्य मै जीते जी न कर पाउ तो वो मरने के बाद सुलभ हो , चाहतो व इच्छाओ का अंत नहीं है , बसर्ते सबकी एक सीमा है ? आगे जाकर मै मरना चाहता  हु ,क्योकि  उसके बाद ही मै अमर हु !!
 लेखक;- लड़के ....... रविकान्त यादव  facebook.com /ravikantyadava 


Monday, December 21, 2015

जीत लो दुनिया (conqueror)

इतिहास में , पोरस, सिकंदर, (अलेक्जेंडर ) अशोक, नेपोलियन, हिटलर, तैमुर जैसे तमाम शासक योद्धा हुए , जो विश्व विजयी बनने  चले थे, बने भी ,। परन्तु जब उन्हें लगा की ये रास्ता गलत है ।
उनकी अंतरात्मा ने एक जगह जाकर उन्हें धिक्कारा  तो अंत समय तक वो पछताते रहे  , कि उन्हें कुछ नहीं मिला  की क्या कमाया ?, इस समय उन्हें एक बूढ़े व्यक्ति, बालक, निरीह जीव, आदि किसी की प्रेरणा ,बात उन्हें बदलने के लिए पर्याप्त थी ।

एक व्यक्ति जंगल से गुजर रहा था , उसने देखा एक शेर शावक अधमरी हालत में है ,पास जाकर देखा तो शेर के पैरो में कील धसी थी , उसने उसे निकाल दिया , बहुत दिनों बार राजा ने उसे कसी बात पर मृत्यु दंड दिया उसे भूखे शेर के सामने फेक दिया गया , आस्चर्य शेर ने उसे खाने से इंकार कर दिया , ये वही शेर था जिसे उस व्यक्ति ने कील निकाल  कर मदद किया था , राजा ने यह आस्चर्य देख उसे क्षमा दान दे दिया ।
विश्व विजेता क्या होना चाहिए ?, एक बालक की मासूम मुस्कान, एक भिखारी की दरिया दिली , दानवीरता ,
एक साधू की दिल पर दस्तक देने वाली संगीत,  सद्बुद्धि , कुछ लोगो के ढोल पर मस्त लयबद्ध कदम, एक गुरु का  आशीर्वाद, किसी के नेकी का ध्यान रखना , नेकी सीखना , पालन करना  बस यही बाते है , दुनिया जीतने  के लिए । 

अगर हम देखे तो तमाम ऐसे लोग हुए जो विश्व विजयी बने इनमे महात्मा गांधी , शेक्सपीअर , अल्फ्रेड नावेल, थॉमस अल्वा एडिसन, मार्कोनी, बेयर्ड , चार्ल्स  बेवेज  , सुकरात, अरस्तु, मदर टेरेसा, डा विन्ची , पिकासो, आइंस्टीन, कबीरदास, नास्त्रेदमस, अब्राहम लिंकन , कोलम्बस, बेंजामिनफ्रेंकलिन, डॉन ब्रेडमेन ,  मेजर ध्यानचंद, स्टेफेन हाकिंग ,रविन्द्र नाथ टैगोर,मार्क जुगरबर्ग,मेनका गांधी , आदि -आदि इनका बड़कपन इनकी उपलब्धियों से ज्यादा इनकी शालीनता में है ।
तो फिर  सोचना क्या ? हम आप बेबाक खुले दिल से दुनिया जीतने  चलते है ।
मुस्कराये व मुस्कान बांटे दरिया दिल हिम्मते  -मर्दा- तो  मदते  खुदा ।
लेखक;- दुनिया से  ....... रविकान्त यादव join me on facebook.com/ravikantyadava





Saturday, December 19, 2015

धर्मज्ञ (savant person )

हम अक्सर whatapp पर एक धर्म को लेकर एक दमदार मगर बरगलाने वाला बयान पढ़ते है ,। 
कही कोई दूसरा हम पर तो कही हम उसपर दमदार सधे वकील की तरह तमाम दलीले देकर समझाते  है । हम अपनी बात पर सही बन  गए । 

 

मै पूछता हु हम होते कौन है ,? एक दूसरे के धर्म के ऊपर बात करने वाले ,हम अपना ही धरम ही  सही से जान जाये वही बहुत है , सांप तो हर धर्म में मुह उठाये फिरते रहते है ,। 

पर हम यह क्यों भूल जाते है ,एक ईगल -चील -बाज़ कभी भी अनजान सांप को कभी भी ख़त्म कर सकती है ,धर्म के नाम पर भ्रमित करने वालो का स्वयं न कोई मंजिल होती है , न कोई रास्ता ये तो वो सांप होते है , जो जहर उगलने को तत्पर रहते है ।
और पता न जाने कब ईश्वर रूपी चील के पंजे से बच नहीं पाते । 
धर्म अच्छे लोगो से बनता है , लड़ाई धर्म की नहीं है,लड़ाई सज्जनता और दुर्जनता की है ,।  हम यह क्यों भूल जाते है सभी धर्मो की बातो को जोड़ने पर भी एक धर्म बनता है ,और उसे खोजना जरुरी है । 
धर्म हमें दिग्भ्रमित होना नहीं सिखाता , ग्रन्थ  पढ़कर क्या होगा कोयले को दूध से धोने पर वह सफ़ेद थोड़े हो जायेगा , हम जानते है क्या सही है ,क्या गलत । क्यों कि हम अकेले धर्म के ठेकेदार नहीं है । 
जो अपने धर्म को जानेंगे वो दुसरो के धर्म पर अंगुली नहीं उठाते ,। 
हम क्या है ? हिन्दू -मुस्लिम -सिख-ईसाई -बौद्ध -जैन या इंसान यदि आप इसका उत्तर रखते या जानते है तो ही आप धर्मज्ञ है । 

                        लेखक;-धर्म से...... रविकान्त यादव join me on facebook.com/ravikantyadava