Thursday, April 28, 2016

धर्मेश (lord of religion )


हमारे धर्मग्रन्थ में रचित रामायण से एक कहानी , माता  सीता और भ्राता लक्षमण के शोक में  एक बार भगवान् राम अपने महल में थे , वहा  उन्होंने फर्श  पर एक दरार में अपनी अंगूठी गिरा  दी तथा हनुमान जी से उसे लाने को कहा , हनुमान जी ने अत्यन्त छोटा रूप भवरे जैसा बनाया व वे अंगूठी के पीछे -पीछे भागे ,अंगूठी पाताल  लोक होते हुए किसी अंजान जगह जा गिरी हनुमान जी भी  वहा पहुंचे परन्तु जिस जगह वह पहुंचे वहा तमाम अंगूठियों का पर्वत नुमा ढेर था । हनुमान जी ने अंगूठी उठाई परन्तु आश्चर्य  सारी  अंगूठी श्री राम भगवान् की ही थी । उन्होंने   वहां स्थित जो  वहा का रक्षक था से पूछा तो उसने कहा आप  अजेय अमर हनुमान हो व पहले भी नहीं हो । 

ये  सारी  अंगूठियां  श्री राम की ही, है । परन्तु अलग अलग युग काल व अलग अलग ग्रहों पर उत्पन्न हुए श्रीराम की है । यह सैकड़ो हज़ारो कल्पो  से चली आ रही अंगूठियों का ढेर है । अभी और भी कितने राम होगे और ये अंगूठियों का ढेर बढ़ने हेतु भी अभी काफी जगह है । 
इतना सुन कर हनुमान रोने लगे व समझ गए श्रीराम ने उन्हें ज्ञान के उद्देश्य मात्र  से ही यहाँ  भेजा था । 
यह रामायण की कहानी ब्रह्माण्ड में पृथ्वी जैसे बहुतायत असंख्य ग्रहों  की तरफ ही इंगित करती है । 
वो कहते  है , न कि विज्ञान जहां समाप्त होता है , धर्म  वहा से आरम्भ होता है , तब जानकार लोग धर्म -धर्म चिल्लाते है ,। जिस दिन हम मानव मंगल या चांद जैसे ग्रह पर वृक्ष या पेड़ पौधे ऊगा लेंगे  वहा बसने  में कामयाब भी हो जाएंगे । 
२) एक चरवाहा था , अपने साथियो संग खेल खेल में वह राजा बन कर एक टीले पर बैठता , टीले पर बैठते ही उसमे गजब की न्याय व तर्क व धर्म की शक्ति आ जाती वह ऐसे फैसले सुनाता की लोग आस्चर्य हो जाते , धीरे धीरे यह बात राजा भोज तक पहुंची , राजा भोज ने उस टीले की खुदाई कराइ तो वहा  एक सिंघासन मिला ,   जो राजा विक्रमादित्य का था ,।  राजा भोज ने उसे झाड़ पोंछ कर रखवाया  तो वह जगमगा चमचमा उठा , । 
राजा भोज उस पर आसीन होने गए तो उस सिंघासन पर बानी 32  पुतलियों (स्त्रीलिंग) या परी  में से एक ने प्रकट होकर उन्हें रोका तथा एक कहानी सुनाई व कहा यदि वो इस तरह योग्य है , तभी इस सिंहासन  पर बैठे , इस तरह 32 पुतलियों ने उन्हें 32 दिन 32 कहानिया सुनाई , व अंत में राजा भोज को उस श्रीहीन सिंहासन का परित्याग करना पड़ा , वह उस पर आसीन योग्य नहीं था ।
 अतः कह सकते है , किसी की उपलब्धियों को देखकर या जान कर उसके जैसी बराबरी उचित नहीं है , जो जिस योग्य है , उसे अपनी योगयता में ही रहना चाहिए , पर संपत्ति पर कुदृष्टि  सही नहीं है । 
लेखक;- कहानियो से ...... रविकान्त यादव  for more click ;-facebook.com/ravikantyadava 






Monday, April 4, 2016

ब्रह्मांड (cosmic)

आकाश के तारे खोजने और गिनने बैठो तो धरती पर रेत के कण भी कम पड जाये ,। 
ये तो केवल हमारी आकाश गंगा का हाल है , आकाश गंगा का अर्थ ब्रह्माण्ड में तमाम असंख्य चाँद, तारे (सूर्य) ग्रह , उपग्रह , सुपरनोवा , पुच्छल तारे , ब्लैक होल या दुनिया होता है । 
इनमे ब्लैक होल का रहस्य इसकी ग्रेविटी है , जिससे एक नारंगी का वजन पुरे माउंट एवेरेस्ट के बराबर होता है । इसी तरह असंख्य आकाश गंगाए (galaxy )और भी है । 
इनमे कई तारो का प्रकाश हम तक आने में लाखो करोडो साल लग जाते है । याद रहे प्रकाश की गति से बढ़कर अभी तक कुछ नहीं है , । अर्थात प्रकाश की गति सबसे तेज होती है , जिसकी स्पीड या गति  299792458 metres मीटर per second है ॥ 

और मानव की औसत आयु वेदो में 100 साल ही आंकी गयी है । यानि अगर हमारे दादा के दादा कोई सन्देश अन्य ग्रह पर भेजे होगे तो वह हमें आज मिलना संभव हो सकता है । 

अभी तक ब्रह्माण्ड का कोई ओर -छोर  नहीं है , अनन्त है , और यह बढ़ता ही जा रहा है , विस्तारित होता जा रहा है , फिर भी अभी तक पृथ्वी (earth ) या धरती को छोड़ अन्य कही जीवन तक नहीं खोजा गया है ,या नहीं खोज जा सका है  , सभ्यता की तो बात ही छोड़ दीजिये । 

ब्रह्माण्ड में पृथ्वी की स्थिति रेत के कण जैसी ही है , । अगर ब्रह्माण्ड का कोई ओर -छोर  है , तो आगे क्या है ???यह  कौतुक पूर्ण है । 

 हिन्दु धर्म ग्रंथो में एक  कहानी आती है । तीन प्रमुख देवो में से  दो ब्रह्मा  व विष्णु को अहंकार हो जाता है ,कि मैं ही श्रेष्ठ  हु , दोनों शिव के पास जाते है , व निर्णय सुनाने को कहते है ,।
तो शिव जी उन्हें एक स्थान पर जाकर दोनों को ओर -छोर पता लगाने को कहते है , । दोनों अपना -अपना दिशा उचाई और नीचाई तय कर  आदि -अंत पता करने चल पड़ते है , कितने ही वर्ष बीत जाते है ,परन्तु उन्हें ओर -छोर का दूर दूर तक पता ही नहीं चलता है ,ब्रह्मा , विष्णु समझ जाते है , ओर -छोर पता लगाना असम्भव है ।  ऐसे में ब्रह्मा को एक केतकी का पुष्प मिलती  है , ब्रह्मा उससे आदि -अंत के बारे में पूछते है , तो वह बताती है , की कई युगों से वह स्वयं ओर छोर तय नहीं कर पा रही है ।

ब्रह्मा -विष्णु दोनों लज्जित वापस शिव जी के पास आ जाते है । वर्तमान समय में केतकी का फूल ही नासा द्वारा छोड़ा गया satelite  (उपग्रह ) है , जो चलता जा रहा है । वही हमारे धर्म में शिव को महाकाल कहा गया है , इसका   आशय  जो काल , समय से परे है , अजेय -अमर है । 
यह कहानी ब्रह्माण्ड के ओर -छोर की तरफ ही इंगित करती है , । जब प्रमुख देवता तक ब्रह्माण्ड का आदि-अंत तक नहीं जानते तो वह कौन है ? जो ब्रह्मांड बनाता व जानता है । फिलहाल हम मानवों का विज्ञान देवताओ की तुलना में बहुत तुच्छ है । 

लेखक;- समय  के यात्री.... रविकान्त यादव join me ;-facebook.com/ravikantyadava