Monday, August 1, 2016

मार्ग ( way )

एक भक्त 3 किलोमीटर जाकर भगवान् को उनका प्रिय पुष्प अर्पित करता , उसकी तपस्या पूर्ण हो चुकी थी , परंतु भगवान  थे की आने को ही नहीं रहे , वह पत्थरो पर सर मारता फ़रियाद करता , मेरे पुष्प अर्पण में क्या कमी रह गयी ?
भगवान तुरंत आ गये , बोले हे भक्त , मुझे पाना चाहते तो वही पा जाते जहा से तुम ये पुष्प तोड़ लाते हो , परंतु तुम ब्यर्थ के आडम्बर में फँसे  रहे । 
मैं उन पुष्पो के मुस्कान में था , वहा उड़  रही तितिलियो में था , वहा मंडराते  भवँरो में था , उस बगीचे के पेंड़ो , पत्तियो, छायाओ , फलो, पक्षियों , सुगन्धित हवाओ में था , मैं पल -पल तुम्हारे साथ भी था , । 
परंतु तुम तो व्यर्थ कर्म कांडो में पड़े रहे , एक भक्त से कीमती भगवान् के लिए कुछ नहीं होता ।। 

प्रश्न है , ईश्वर की बनाई दुनिया में उसे ही हम क्या अर्पण करे ??
बस नजरिया  और भावना होनी चाहिए । 
ईश्वर प्रत्येक जगह है , प्रकृति व जीव जंतु हेतु सेवा , दया , परोपकार, सम्मान ,  कर्तव्य  ही ईश्वर को पाने का मार्ग है ॥ 

लेखक;- जीवन मार्ग से........ रविकान्त यादव 
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1 comment:

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